SurYatra : A Musical Carvan

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अलविदा दिनेश चन्द्र शर्मा!

by pavanjha on Jul.19, 2010, under People, tribute

कुछ सुबहें बहुत काली होती हैं.. रात के घनघोरतम अंधेरे से भी काली! ऐसी ही एक सुबह से आज सुबह मुलाकात हुई जब अलस भोर में टेलीफोन पे मिले एक समाचार से अंधेरा सा छा गया.. दिनेश चन्द्र शर्मा जी नहीं रहे!

dcs बहुत से लोगों के लिये ये नाम अनजाना सा प्रतीत हो सकता है, मगर सुरयात्रा और उसके प्रारम्भिक दौर में जुड़े सुरयात्रियों के लिये बहुत अपनापन लिए हुए है! सुरयात्रा के साथ उनका रिश्ता सुरयात्रा के जन्म के साथ ही बन गया था और 9 दिसम्बर 2001 सुरयात्रा की पहली गोष्ठी में संगीतकार दान सिंह के साथ विशिष्ठ अतिथि के रूप में शामिल हो कर सुरयात्रा के जन्म के साक्षी बने। सौम्य, शांत और मिलनसार प्रकृति के दिनेश जी अपने अंदर फ़िल्मों के लिए दीवानगी और जानकारियों का एक समुद्र समाये हुए थे। उनकी गज़ब की याद्दाश्त उनके व्यक्तित्व का एक खास हिस्सा थी।

दिनेश जी का जन्म 12 जनवरी 1936 को महाराष्ट्र के धूलिया गाँव मे हुआ था और अन्त तक वे वहीं के होके रहे। बचपन से ही फ़िल्मों का एक जूनून सा था उनमें. उस दौर के कलाकार मारुतिराव पहलवान उन्हीं के गाँव के थे और पूरे गाँव में पूजे जाते थे। मारुतिराव के इनके परिवार से घनिष्ठ संबंध थे और अकसर भोजन पे फ़िल्मों का जिक्र होता रहता था। ऐसे माहौल में उनका सिनेमा का शौक परवान चढ़ा। सिनेमा से उनका रिश्ता ऐसा जुड़ा कि फ़िल्म देखते हुए उसके हर-एक पहलू पे पैनी नज़र जिसमें कि खासकर गीत फ़िल्मांकन, नृत्य कलाकार और चरित्र अभिनेता की छाप हमेशा के लिए दिल में घर कर गई हो जैसे। जब भी जयपुर आते थे या मिलना होता था, उनके साथ बातें करते घंटों बीत जाते थे और समय का पता ही नहीं चलता था। जहां भी जाते थे अपने साथ यादों का एक पूरा काफ़िला लेकर साथ चलते थे। बचपन में 4 महीने की उम्र में ही पिता को खो चुके दिनेश जी ने पूरी उम्र अभावों मे गुजारी मगर अभावों को अपने शौक, अपनी दीवानगी के आड़े नहीं आने दिया। घर के पास में जाकर चाय की थड़ी पर घंटो गुजारना ताकि रेडियो पर बज रहे ज्यादा से ज्यादा गाने सुन सकें और अखबारों से ज्यादा से ज्यादा जानकारी पढ़ सकें। वहीं से पुराने अखबार इकठ्ठे करके लाना और अपने संग्रह में जमा करना।

Diensh Sharma हिन्दी फ़िल्मों पे लिखी कई पुस्तकों में उनके योगदान का जिक्र है, मगर उनसे कहीं ज्यादा संख्या उन योगदानों की है जिसका जिक्र नहीं हुआ। मुम्बई के अजीत प्रधान और प्रीतम मेंघानी जब रफ़ी साब पर किताब लिख रहे थे तो दिनेश जी ने ही फ़िल्मांकन की जानकारी देने का प्रस्ताव रखा और उस किताब को एक अनूठा योगदान दिया। इसी तरह कमल धीमान और राज कुमार राणा, जब किशोर कुमार पर अपनी किताब लिख रहे थे तो उसमें लगभग हर गीत के फ़िल्मांकन की जानकारी दिनेश जी की यादों से निकली थी। वरना 50 साल बाद किसको पता था कि 1952 की फ़िल्म रंगीली में किशोर कुमार का दोहरी आवाजों में गाया ’बैयां छोड़ बलम घर जाना” याकूब और मुमताज अली (महमूद के पिता) पर फ़िल्माया गया था। इसी तरह की हज़ारों जानकारियां उन दोनो किताबों को फ़िल्म संगीत के ’डॉक्युमेंटेशन’ में एक अलग स्तर पे ले जाती हैं।

हरीश रघुवंशी जब ’जी’ मैग्ज़ीन के लिये स्कोर बोर्ड में अनूठी जानकारियां देते तो तो कई बार दिनेश जी का योगदान रहता था। गीतकोष में दी गईं कुछ जानकारियों में भी उनका योगदान रहा जैसे राज कपूर की 1953 में फ़िल्म लहरें में मेहमान कलाकार के रूप में की गई भूमिका। कई बार उनको किसी कलाकार का नाम नहीं मिलता था तो ढूंढने के लिये बैचेन हो जाते.. नहीं मिलता तो अपनी ओर से एक कोड नेम दे देते.. जैसे एक जूनियर कलाकार जो बहुत सी फ़िल्मॊ के गीतों में तबलची का रोल करते हुए दिखा, उसका किसी से नाम नहीं मिल पाया तो उन्होंने उसका नाम ’तबलची’ रख दिया, क्यूंकि उस कलाकार का नाम नहीं पता था मगर किस किस गीत में उसे देखा है ये याद था उन्हें । बरसों बाद उन्हें वीर दुर्गादास के निर्माता एस. जी. लाड से पता चला कि उस ’तबलची’ कलाकार का असली नाम दीनानाथ है और प. भरत व्यास का बहुत करीबी जानकार है और उसको कई फ़िल्मों में प. भरत व्यास ने ही काम दिलवाया था। ये जानकारी मिलने के बाद उनके तबलची को नाम मिल गया और उनके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। इसी तरह से फ़िल्म एक ही रास्ता के ’चली गोरी पी से मिलन को चली’ में प. लच्छू महाराज, या फ़िर ’अनारकली’ के ’जाग दर्दे-इश्क जाग’ को पर्दे पे साकार करने वाले ’इब्राहिम’ के लिये उन्होने बरसों तलाश की और ढूंढ के ही निकाला।

संगीत में संगीतकार रोशन उनके सबसे पसंदीदा संगीतकार रहे, मुझे याद है उनके पास रोशन के सभी गीत थे, उनकी पहली फ़िल्म ’नेकी और बदी’ के कुछ गीत छोड़ कर. उस समय जब केदार शर्मा की स्मृति में निकला ’वन एंड लोनली केदार शर्मा’ का पैक उन्हें दिया जिसमें नेकी और बदी के भी कुछ गीत थे तो उनके चेहरे की रौनक देखते ही बनती थी। उनका अंग्रेजी का ज्ञान बहुत सीमित था फिर भी हॉलीवुड की फ़िल्में बहुत शौक से देखते थे और 40 और 50 के दशक की हॉलीवुड की फ़िल्मों और कलाकारों की जबरदस्त जानकारी थी उन्हें। अभी हाल में उन्होने एक अनूठी जानकारी दी कि फ़िल्म बूट पॉलिश में ’चली कौन से देस गुजरिया’ के फ़िल्मांकन में गीतकार शैलेन्द्र और बेबी नाज़ के अलावा जो एक बाल नृत्यांगना है वो खेमचन्द प्रकाश जी की बेटी चन्द्रकला है । इसकी खबर स्व. चन्द्रकला जी के पति, प्रख्यात नाट्य निर्देशक राम गोपाल बजाज और बेटे रिजु बजाज के पास पहुंची तो उन्हें भी काफ़ी आश्चर्य हुआ।

मुझसे उम्र में दोगुने बड़े थे मगर दोस्तों की तरह ही मिलते थे! मुझे याद है इक बार कार में मेरे साथ जाते हुए कैसेट पे जैसे ही सलिल दा की अमानत का हेमंत-गीता का गाया गीत ’हो जबसे मिले तोसे अंखियां’ अचानक से बजा, उनकी आंखों में चमक सी आई और सीट से वे लगभग उछल ही पड़े.. बोले बहुत दिनों बाद सुना है ये गीत, जो कि मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में है फिर उसके मूल स्त्रोत के बारे में बात करने लगे। कई महीनों बाद मेरे जन्मदिन के दिन सुबह मोबाईल की घन्टी बजी और ’हैलो’ की बजाय वो गीत सुनाई दिया.. फिर आवाज आई कि बताइये आज आपको किसने याद किया है! अब बताईये ऐसे इंसान को कौन भूल सकता है। उनका जाना मेरे और समस्त सुर यात्रियों के लिये तो एक व्यक्तिगत क्षति है ही, हिन्दी फ़िल्मों और संगीत के समस्त चाहने वालों के लिए भी एक बहुत बड़ा नुकसान है। अपने अन्दर जानकारियों का अमृत समेटे हुए ये समुद्र आज सुबह एक बूंद बन कर हमेशा के लिए उड़ गया! जाते जाते वही बूंद आंखों मे दे गया! हमेशा के लिए!

- पवन झा (साथ में एम.डी. सोनी)

Pavan Jha, MD Soni, Raaj Kumar Rana, Dinesh sharma, Arun Agrawal, Kamal Dheeman Honoring Sh. Daan Singh ji and Sh. Dinesh Chandra Sharma on first ever Suryatra meet

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